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वन पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्क्षिप्तभ्रूर्विवृत्ताक्षः संहतभ्रुकुटीमुखः |  १९   क
स्विन्नगात्रोऽभवद्भीमो न चोद्धर्तुं शशाक ह ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति