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वन पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
को भवान्किंनिमित्तं वा वानरं वपुराश्रितः |  २   क
व्राह्मणानन्तरो वर्णः क्षत्रिय़स्त्वानुपृच्छति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति