वन पर्व  अध्याय १४७

वैशम्पाय़न उवाच

यत्नवानपि तु श्रीमाँल्लाङ्गूलोद्धरणोद्धुतः |  २०   क
कपेः पार्श्वगतो भीमस्तस्थौ व्रीडादधोमुखः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति