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वन पर्व
अध्याय १४७
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हनूमानु उवाच
तस्य भार्या जनस्थानाद्रावणेन हृता वलात् |  ३०   क
वञ्चय़ित्वा महावुद्धिं मृगरूपेण राघवम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति