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वन पर्व
अध्याय १४७
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हनूमानु उवाच
दिव्यो देवपथो ह्येष नात्र गच्छन्ति मानुषाः |  ४१   क
यदर्थमागतश्चासि तत्सरोऽभ्यर्ण एव हि ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति