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वन पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
वानरोऽहं न ते मार्गं प्रदास्यामि यथेप्सितम् |  ५   क
साधु गच्छ निवर्तस्व मा त्वं प्राप्स्यसि वैशसम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति