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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे |  ४२   क
मुहूर्तं नाशकं वक्तुं किञ्चिद्दुःखपरिप्लुतः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति