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उद्योग पर्व
अध्याय १४७
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वासुदेव उवाच
हीनाङ्गं पृथिवीपालं नाभिनन्दन्ति देवताः |  २५   क
इति कृत्वा नृपश्रेष्ठं प्रत्यषेधन्द्विजर्षभाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति