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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च समरे द्रोणं निघ्नन्तं पाण्डवीं चमूम् |  १३   क
विव्यधुः सोमकास्तूर्णं समन्ताच्छरवृष्टिभिः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति