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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रोणोऽहरत्प्राणान्क्षत्रिय़ाणां विशां पते |  १४   क
रश्मिभिर्भास्करो राजंस्तमसामिव भारत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति