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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
अपरे मोहिता मोहात्तमेवाभिमुखा यय़ुः |  १७   क
पाण्डवानां रणे योधाः परलोकं तथापरे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति