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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
सा तथा पाण्डवी सेना वध्यमाना महात्मभिः |  १८   क
निशि सम्प्राद्रवद्राजन्नुत्सृज्योल्काः सहस्रशः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति