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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
पश्यतो भीमसेनस्य विजय़स्याच्युतस्य च |  १९   क
यमय़ोर्धर्मपुत्रस्य पार्षतस्य च पश्यतः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति