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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं तु तत्सैन्यं द्रोणकर्णौ महारथौ |  २१   क
जघ्नतुः पृष्ठतो राजन्किरन्तौ साय़कान्वहून् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति