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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु प्रभग्नेषु दीर्यमाणेषु सर्वशः |  २२   क
जनार्दनो दीनमनाः प्रत्यभाषत फल्गुनम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति