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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
भवद्भ्यामिह सङ्ग्रामो क्रुद्धाभ्यां सम्प्रवर्तितः |  ३   क
आहवे निहतं दृष्ट्वा सैन्धवं सव्यसाचिना ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति