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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
तत उत्सृज्य पाणिभ्यः प्रदीपांस्तव वाहिनी |  ३३   क
युय़ुधे पाण्डवैः सार्धमुन्मत्तवदहःक्षय़े ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति