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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
यद्यहं भवतोस्त्याज्यो न वाच्योऽस्मि तदैव हि |  ५   क
आवां पाण्डुसुतान्सङ्ख्ये जेष्याव इति मानदौ ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति