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विराट पर्व
अध्याय ५
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अर्जुन उवाच
न चापि विद्यते कश्चिन्मनुष्य इह पार्थिव |  १३   क
उत्पथे हि वने जाता मृगव्यालनिषेविते ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति