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आदि पर्व
अध्याय १४८
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व्राह्मण उवाच
नगरं चैव देशं च रक्षोवलसमन्वितः |  ५   क
तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भय़म् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति