शान्ति पर्व  अध्याय १४८

शौनक उवाच

तस्मात्तेऽहं प्रवक्ष्यामि धर्ममावृत्तचेतसे |  १   क
श्रीमान्महावलस्तुष्टो यस्त्वं धर्ममवेक्षसे |  १   ख
पुरस्ताद्दारुणो भूत्वा सुचित्रतरमेव तत् ||  १   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति