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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
यस्यैवं वलमोजश्च स धर्मस्य प्रभुर्नरः |  १७   क
व्राह्मणानां सुखार्थं त्वं पर्येहि पृथिवीमिमाम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति