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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
अनुगृह्णन्ति भूतानि स्वेन वृत्तेन पार्थिव |  २   क
कृत्स्ने नूनं सदसती इति लोको व्यवस्यति |  २   ख
यत्र त्वं तादृशो भूत्वा धर्ममद्यानुपश्यसि ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति