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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
विकर्मणा तप्यमानः पादात्पापस्य मुच्यते |  २२   क
नैतत्कार्यं पुनरिति द्वितीय़ात्परिमुच्यते |  २२   ख
चरिष्ये धर्ममेवेति तृतीय़ात्परिमुच्यते ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति