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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
यावतः प्राणिनो हन्यात्तज्जातीय़ान्स्वभावतः |  २५   क
प्रमीय़माणानुन्मोच्य भ्रूणहा विप्रमुच्यते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति