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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
वृहस्पतिं देवगुरुं सुरासुराः; समेत्य सर्वे नृपतेऽन्वय़ुञ्जन् |  २८   क
धर्मे फलं वेत्थ कृते महर्षे; तथेतरस्मिन्नरके पापलोके ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति