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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
उभे तु यस्य सुकृते भवेतां; किं स्वित्तय़ोस्तत्र जय़ोत्तरं स्यात् |  २९   क
आचक्ष्व नः कर्मफलं महर्षे; कथं पापं नुदते पुण्यशीलः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति