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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
ततः स राजा व्यपनीतकल्मषः; श्रिय़ा युतः प्रज्वलिताग्निरूपय़ा |  ३५   क
विवेश राज्यं स्वममित्रकर्शनो; दिवं यथा पूर्णवपुर्निशाकरः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति