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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
यो दुर्वलो भवेद्दाता कृपणो वा तपोधनः |  ४   क
अनाश्चर्यं तदित्याहुर्नातिदूरे हि वर्तते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति