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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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शौनक उवाच
यो मर्त्यः प्रतिपद्येत आय़ुर्जीवेत वा पुनः |  ९   क
यज्ञमेकान्ततः कृत्वा तत्संन्यस्य तपश्चरेत् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति