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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
होमकाले यथा वह्निः कालमेव प्रतीक्षते |  १५   क
ऋतुकाले तथा नारी ऋतुमेव प्रतीक्षते |  १५   ख
न चान्यां गच्छते यस्तु व्रह्मचर्यं हि तत्स्मृतम् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति