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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
अमृतं व्राह्मणा गाव इत्येतत्त्रय़मेकतः |  १६   क
तस्माद्गोव्राह्मणं नित्यमर्चय़ेत यथाविधि ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति