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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
गुरुभ्य आसनं देय़मभिवाद्याभिपूज्य च |  १९   क
गुरूनभ्यर्च्य वर्धन्ते आय़ुषा यशसा श्रिय़ा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति