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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
सदैव तु मय़ा तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः |  २०   क
सर्वाण्येवान्नपानानि भक्ष्याश्चोच्चावचास्तथा |  २०   ख
भवन्तु सत्कृतानीति पूर्वमेव प्रचोदितः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति