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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
धर्म एव रतिस्तेषामाचार्योपासनाद्भवेत् |  ४   क
देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्मं पर्युपासते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति