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वन पर्व
अध्याय १४८
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हनूमानु उवाच
न विग्रहः कुतस्तन्द्री न द्वेषो नापि वैकृतम् |  १५   क
न भय़ं न च सन्तापो न चेर्ष्या न च मत्सरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति