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अनुशासन पर्व
अध्याय २८
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मतङ्ग उवाच
श्रेष्ठं यत्सर्वभूतेषु तपो यन्नातिवर्तते |  २७   क
तदग्र्यं प्रार्थय़ानस्त्वमचिराद्विनशिष्यसि ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति