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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति क्वचिच्छ्रिय़म् |  ६७   क
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च पतन्ति ते ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति