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कर्ण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
अभूतां तावदृश्यौ च शरजालैः समन्ततः |  १५   क
मेघजालैरिव च्छन्नौ गगने चन्द्रभास्करौ ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति