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वन पर्व
अध्याय १४८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं तु कृतमिच्छामि त्वय़ार्याद्य प्रिय़ं मम |  ३   क
यत्ते तदासीत्प्लवतः सागरं मकरालय़म् |  ३   ख
रूपमप्रतिमं वीर तदिच्छामि निरीक्षितुम् ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति