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वन पर्व
अध्याय १३५
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यवक्रीरु उवाच
नाय़ं शक्यस्त्वय़ा वद्धुं महानोघः कथञ्चन |  ३७   क
अशक्याद्विनिवर्तस्व शक्यमर्थं समारभ ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति