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वन पर्व
अध्याय १४८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं तुष्टो भविष्यामि श्रद्धास्यामि च ते वचः |  ४   क
एवमुक्तः स तेजस्वी प्रहस्य हरिरव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति