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वन पर्व
अध्याय १४८
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वैशम्पाय़न उवाच
न तच्छक्यं त्वय़ा द्रष्टुं रूपं नान्येन केनचित् |  ५   क
कालावस्था तदा ह्यन्या वर्तते सा न साम्प्रतम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति