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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
एतत्ते कथितं राजन्कार्त्तिकेय़ाभिषेचनम् |  ८८   क
शृणु चैव सरस्वत्यास्तीर्थवंशस्य पुण्यताम् ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति