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उद्योग पर्व
अध्याय १४८
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वासुदेव उवाच
प्रय़च्छन्तु च ते राज्यमनीशास्ते भवन्तु च |  १५   क
यथाह राजा गाङ्गेय़ो विदुरश्च तथास्तु तत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति