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उद्योग पर्व
अध्याय १४८
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वासुदेव उवाच
एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा नैव भावं व्यमुञ्चत |  १७   क
दण्डं चतुर्थं पश्यामि तेषु पापेषु नान्यथा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति