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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
चङ्क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान्वहून् |  २५   क
पद्भ्यां घ्नन्ति नरा विप्र तत्र किं प्रतिभाति ते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति