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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
न कर्म तव नान्येषां कुतो मम शतक्रतो |  ३६   क
ऋद्धिर्वाप्यथ वा नर्द्धिः पर्याय़कृतमेव तत् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति