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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
धावमानस्य योधस्य क्षुरप्रैः स महामृधे |  १२   क
वाहू चिच्छेद वै कर्णः शिरश्चैव सकुण्डलम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति