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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
ऊरू चिच्छेद चान्यस्य गजस्थस्य विशां पते |  १३   क
वाजिपृष्ठगतस्यापि भूमिष्ठस्य च मारिष ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति